पिछले साल लॉकडाउन खुलते ही शूटिंग पर जाने की हिम्मत दिखाने वाले बॉलिवुड के खिलाड़ी () अब अपनी फिल्म 'बेल बॉटम' (Bell Bottom) को सबसे पहले सिनेमाघरों में लाने का जज्बा भी दिखा रहे हैं। एक खास मुलाकात में हमने अक्षय से इस फिल्म, इसे थिएटर में रिलीज के फैसले, कोविड के बीच शूटिंग, आजादी के मायने, राजनीतिक रुझान आदि पर चर्चा की: आप देशभक्त जवान और एजेंट के रोल पहले भी कर चुके हैं। बेल बॉटम में क्या खास है, जिसके चलते आपने यह फिल्म की? कुछ कहानियां होती है, जो दबी की दबी रह जाती हैं। जैसे एअरलिफ्ट की कहानी है, मीडिया तक को नहीं पता था कि 1 लाख 70 हजार लोगों को बचाया गया था। उन्हें एअरलिफ्ट करके लाया गया था। ऐसी कुछ कहानियां होती हैं, हमारे गुमनाम नायकों (अनसंग हीरोज) की। जैसे ये किरदार जो मैं कर रहा हूं, वो एक रॉ एजेंट है। उसने कैसे यह प्रॉब्लम (हाईजैकिंग) सुलझाई थी, तब क्या क्या हुआ था। निश्चित तौर पर फिल्म थोड़ा-बहुत फिक्शनल भी है। थोड़ा कमर्शल भी है, लेकिन मैं चाहता हूं कि ऐसे किरदार बाहर आएं और लोगों को पता चले कि इनके बारे में। देखिए, हमें बाकी सब चीजें पता चलती हैं, पर ये जो हीरोज होते हैं, उनके बारे में किसी को कोई जानकारी नहीं। ऐसी घटनाएं होती हैं, ऐसे किस्से होते हैं, जो कोई नहीं जानता। जबकि, लोग और हमारी युवा पीढ़ी ये सब जानना चाहती है। इसलिए, जब कोई ऐसी स्क्रिप्ट आती है, तो उसे करने का मेरा मन करता है। ये फिल्म आप लोग पिछले साल लॉकडाउन खुलने के तुरंत बाद तब शूट करने गए, जब हर तरफ अनिश्चितता थी। क्या सोचकर ये कदम उठाया? रिस्क नहीं लगा? रिस्क तो बहुत बड़ा था, पर वाशु भगनानी और हमने फैसला लिया कि उधर प्रोटोकॉल के साथ शूटिंग हो रही है, तो चलो, वहां जाकर शूटिंग करते हैं। उन्होंने एक ही बात पूछी कि क्या आप तैयार हैं? तो मैंने बोला कि मैं तैयार हूं। मैं आ जाता हूं, तो हमने अपने परिवार को लिया। 200 आदमी लिए। पूरा एअर इंडिया का प्लेन बुक किया और चले गए। वहां जाकर शूटिंग की। कोई घटना नहीं घटी। सबकुछ प्रोटोकॉल के साथ हुआ और आप देखिए फिल्म। जब आप फिल्में देखेंगे, तो आपको लगेगा नहीं कि कोरोना टाइम के वक्त ये इतनी बड़ी फिल्म बनाई गई है। आप देखकर उस हिसाब से जरूर सोचना। इसमें बहुत ज्यादा मेहनत लगी और इसका सारा श्रेय प्रॉडक्शन और आर्ट डायरेक्टर को जाता है। अब सिनेमाघर खुलने से पहले ही आप लोग ये फिल्म थिएटर्स में लेकर आ रहे हैं। ये भी एक रिस्क ले रहे हैं! नहीं, थिएटर्स खुल गए हैं। सिर्फ महाराष्ट्र में नहीं खुले हैं, लेकिन हम उम्मीद कर रहे हैं कि सबकुछ ठीक रहा और भगवान ने चाहा, तो शायद यहां भी हो सकता है कि खुल ही जाए। अगर ऐसा नहीं भी हुआ, तो हम फिल्म लेकर आ रहे हैं और उम्मीद कर रहे हैं कि लोग पूरे एहतियात के साथ फिल्म देखने आएं। प्रोटोकॉल को फॉलो करें। ये फिल्म 15 अगस्त के मौके पर आ रही है। इसके साथ दो और देशभक्ति फिल्में भुज: द प्राइड ऑफ इंडिया और शेरशाह भी ओटीटी पर आ रही है। ऐसे में, लोगों का कहना है कि बॉलिवुड के लिए देशभक्ति एक फॉर्मूला बन चुकी है। आप क्या कहेंगे? मैं तो हर किस्म की फिल्में करता हूं। चाहें वो देश पर हो, चाहे वो टॉयलट पर हो, चाहे वो सैनिटरी पैड पर हो या फिर चाहे वह 'हाउसफुल' जैसी फिल्म हो। चाहे वो पृथ्वीराज चौहान हो, तो ऐसा नहीं है। मैं तो अलग-अलग किस्म की फिल्में करता हूं। और आप जिस तादाद में फिल्में कर रहे हैं, लोग कहते हैं कि आप पर कोविड का भी कोई असर नहीं पड़ा। इस महामारी का कोई असर पड़ा? मुझे कोविड हुआ न। मैं 14 दिन क्वारंटीन में रहा, लेकिन इंजेक्शन लिया, सब एहतियात किया, तो ठीक है। देखिए, काम पर तो चलना ही है। आप भी यहां आई हैं, इटरव्यू लेने के लिए, आप भी काम कर रही हैं। बाहर पुलिसवाला खड़ा है, वो काम पर है। डॉक्टर काम पर हैं। ऐक्टर्स काम पर हैं। सबको काम तो करना पड़ेगा। आप कब तक ये सोचकर बैठेंगे कि कोविड है, मैं घर से बाहर नहीं निकलूंगा। नहीं, अगर बाहर निकलकर आपका काम बनता है, तो जाना ही पड़ेगा। हम वापस शूटिंग कर रहे हैं, जहां 300 लोग हैं। मैंने अभी एक फिल्म रक्षाबंधन खत्म की, उसमें 400 लोग काम कर रहे थे, तो काम तो करना ही पड़ेगा। क्या फिल्म को थिएटर में लाने की यह भी एक वजह रही कि सिनेमाघरों पर कोरोना का बहुत ज्यादा बुरा असर पड़ा है? असर तो सभी पर पड़ा है। थिएटर्स पर पड़ा है। पब्लिकेशंस पर असर पड़ा है। बहुत कम प्रफेशन ऐसे होंगे, जिस पर असर नहीं पड़ा है, बाकी तो सब पर ही पड़ा है। अब हमें देखना ये है कि हमें अपने माइंडसेट को वैसा बनाना है कि जो हुआ, उस भूलकर हम ये देखें कि अब आगे क्या कर सकते हैं। जो हो गया, उसको भूल जाएं। आज के समय और आने वाले कल को देखें। आप सामाजिक मुद्दों वाली भी फिल्में काफी करते हैं। कोई ऐसी सामाजिक बुराई है, जो आपको परेशान करती है? एक दहेज का मुद्दा है, जो मुझे बहुत परेशान करता है। कितनी लड़कियां हैं, जो अपनी जान से हाथ धो बैठती हैं। अभी हाल ही में मैंने ऐसी घटना पढ़ी थी। उनकी कहानी देखकर दहेज से मुझे बहुत दुख होता है। उम्मीद है कि धीरे-धीरे बदलाव आएगा। आपके ओटीटी डेब्यू वाले प्रॉजेक्ट 'द एंड' का क्या स्टेटस है? 'द एंड' लिखी जा चुकी है। अगले साल उसकी शूटिंग करेंगे। आपके लिए आजादी के क्या मायने हैं? आजादी के मायने यही है कि हमारे देश ने हमें सबकुछ दिया है। आजादी सांस लेने की। आजादी कुछ बोलने की, कहने की। आज कुछ भी कहो, किसी भी हिसाब से भी देखो, तो जो हमारे देश में हमें मिलता है, वो और देशों में नहीं मिलता है। आपके बहुसंख्यक राजनीति की ओर झुकाव की कई बार आलोचना की जाती है। अपने आलोचकों को क्या जवाब देंगे? वे बोलते क्या हैं! देखिए, मुझे पॉलिटिक्स में तो आना नहीं है। वे क्या सोचते हैं, क्या करते हैं, मुझे नहीं पता। मेरा काम है अच्छी फिल्में बनाना, अच्छी फिल्मों में काम करना और उन्हें लोगों के सामने लाना। बस मैं यही काम करता हूं। मैं कभी ऐसी चीजों में नहीं रहा कि मुझे किसी के बारे में बोलना है कि पॉलिटिकली क्या सही है, क्या गलत है। मुझे उसके बारे में बोलना नहीं है। मुझे अपना काम करना है। मुझे अपनी फिल्में बनानी हैं बस।
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