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Monday, 15 November 2021

'सूर्यवंशी' की कामयाबी के बाद बॉलिवुड में फिर चलेगा मल्टीस्टारर फिल्मों का ट्रेंड?

हाल ही में रिलीज हुई '' ने दिवाली के दौरान सिनेमाघरों में मात्र 5 दिनों के अंदर 100 करोड़ का आंकड़ा पार कर लिया है। यह पहली फिल्म साबित हुई है, जिसने कोरोना के बाद पहले हफ्ते में 100 करोड़ रुपये की कमाई की है। रोहित शेट्टी की इस मसाला एंटरटेनर में दर्शकों को जो सबसे ज्यादा पसंद आया, वो है सेकंड हाफ में 'सूर्यवंशी' अक्षय कुमार के साथ सिंघम उर्फ अजय देवगन और सिंबा अका रणवीर सिंह की तिकड़ी का धमाल। अक्षय, अजय और रणवीर जैसे सितारों से सजी-धजी फिल्म की सुपर सक्सेज के बाद फिल्मी जानकार उम्मीद कर रहे हैं कि निकट भविष्य में एक बार फिर मल्टी स्टार कास्ट वाली फिल्मों का दौर देखने को मिलेगा, जिसकी शुरुआत हो चुकी है। 'पठान', 'टाइगर 3' और 'जी ले जरा' जैसी फिल्मों की स्टारकास्ट पर नजर डाली जाए, तो साफ हो जाता है कि इन फिल्मों में बड़े परदे पर एक से ज्यादा स्टार कहानी में गुंथे नजर आएंगे। हालांकि मल्टीस्टारर फिल्मों का यह चलन आज का नहीं है। दर्शकों ने हमेशा से इस तरह की फिल्मों को हाथों-हाथ लिया है। बीते दशकों में 'शोले', 'अमर अकबर एंथनी', 'दीवार', 'शान', 'कर्मा', 'त्रिदेव', 'सत्ते पे सत्ता', 'हम', 'नसीब', 'गंगा जमुना सरस्वती', 'हम साथ साथ हैं', 'कांटे', 'खाकी', 'कभी खुशी कभी गम', 'दिल चाहता है', 'बॉर्डर', 'नो एंट्री', 'ओमकारा', 'मोहब्बतें', 'धूम', 'रेस', 'थ्री इडियट्स', 'वेलकम', 'जिंदगी मिलेगी ना दोबारा' जैसी अनेकों फिल्में रही हैं, जिनमें सितारों का मेला नजर आया, मगर बीच में एक दौर ऐसा भी रहा, जब एक बड़े सुपर स्टार ने किसी दूसरे सुपर स्टार के साथ स्क्रीन स्पेस शेयर करने के बजाय सिंगल हीरो वाली फिल्मों को तरजीह दी। मगर अब आगामी कई फिल्मों में यही स्टार्स एक-दूसरे के साथ मिंगल करते नजर आ रहे हैं। क्या है वजह? एक पड़ताल। इन फिल्मों में दिखेगा स्टार्स का दमखमसिद्धार्थ आनंद निर्देशित 'पठान' में किंग खान के साथ जॉन अब्राहम, दीपिका पादुकोण, आशुतोष राणा, डिंपल कापड़िया जैसी स्टार कास्ट तो है ही साथ ही सलमान खान भी मेहमान कलाकार के रूप में दिखेंगे, वहीं 'टाइगर 3' में सलमान खान-कटरीना कैफ और इमरान हाशमी के साथ शाहरुख खान भी छोटी-सी भूमिका में नजर आएंगे। फरहान अख्तर की 'जी ले जरा' में भी प्रियंका चोपड़ा, कटरीना कैफ और आलिया भट्ट की तिकड़ी है, तो 'विक्रम वेदा' में रितिक रोशन सैफ अली संग हैं। चर्चा है कि 'सिंघम 3' में अजय देवगन के साथ अक्षय और रणवीर ठीक उसी तरह से नजर आएंगे जैसी 'सूर्यवंशी' में अक्षय के साथ अजय रणवीर दिखे थे। खबरें तो ये भी हैं कि निर्देशक लव रंजन 'प्यार का पंचनामा' के अगले पार्ट में कार्तिक आर्यन के साथ रणबीर कपूर और रणवीर सिंह को साथ ला सकते हैं। हाल ही में जब इस मामले में कार्तिक से पूछा गया था, तो उन्होंने इसकी संभावना से इनकार नहीं किया था। निर्देशक के साथ रेपो और विश्वास होना जरूरी है'जंग', 'कांटे', 'दस कहानियां', 'शूटआउट एट लोखंडवाला', 'शूटआउट एट वडाला', 'मुंबई सागा' जैसी भव्य फिल्मों में स्टार्स का जलवा दिखाने वाले निर्देशक संजय गुप्ता कहते हैं, 'दर्शकों को अगर एक थाली में मनोरंजन के 56 पकवान मिलेंगे, तो उनका खुश होना लाजिमी है। मगर मैं जब कई सितारों वाली फिल्म बनाता हूं, तो वह स्क्रिप्ट की मांग होती है। मेरी तमाम फिल्मों की कहानी ही उस तरह की रही हैं, जहां अनेक स्टार्स फिट बैठते हैं। मल्टी स्टार कास्ट वाली फिल्म बनाना आसान नहीं होता। एक फिल्म में आप नामी कलाकारों को तभी जमा कर पाते हैं, जब उन कलाकारों पर स्टार्स का विश्वास हो। रोहित शेट्टी और आदित्य चोपड़ा उन फिल्मकारों में से हैं, जिन्हे लेकर स्टार्स को यकीन होता है कि उनके रोल के साथ कोई गड़बड़ नहीं होगी।' वहीं 'वेलकम', 'नो एंट्री', 'नो प्रॉब्लम', 'वेलकम बैक', 'पागलपंती' जैसी कई फिल्मों में सलमान, अक्षय, जॉन, अनिल कपूर, नाना पाटेकर जैसे बड़े स्टार्स को साथ लाने वाले निर्देशक अनीस बज्मी के अनुसार, 'इतने बड़े स्टार्स को एक फिल्म में साथ लाना बहुत ही चुनौतीपूर्ण होता है। स्टार्स की डेट्स के अलावा उनके मूड्स को भी संभालना होता है। कई निर्देशक इस तरह की फिल्मों से बचते हैं। इस तरह की फिल्मों के लिए कलाकारों से खास तरह का रेपो होना जरूरी है, जो सालों के अनुभव से आता है। मुझे इंडस्ट्री में 42 साल हो गए हैं और मेरा सेट कलाकारों के लिए पिकनिक जैसा होता है और जब दर्शक मेरी फिल्में देखने थिएटर पहुंचता है, तो इतने स्टार्स के साथ उसे भी मनोरंजन का तगड़ा डोज मिलता है।' रिश्ते बनाए रखने के लिए करते हैं ऐसी फिल्मेंजाने-माने ट्रेड विश्लेषज्ञ कोमल नाहटा कहते हैं, 'मल्टी स्टार कास्ट बनाना निर्देशक के लिए चैलेंजिंग तो होता ही साथ ही स्टार्स को भी अपने बलबूते पर दमखम दिखाने का मौका नहीं मिलता। हर बड़ा स्टार फिल्म का भार अपने कंधे पर उठाकर उसका क्रेडिट लेना चाहता है, मगर जब वो एक से ज्यादा सितारों वाली फिल्म करता है, तब भी उसके एक पंथ से दो काज सिद्ध होते हैं। निर्देशक के साथ उसका रिलेशन भी मेंटेन होता है और स्टार का अपना फायदा भी। ये सच है कि बीच में ऐसी फिल्में कम बनी, क्योंकि मल्टी स्टार कास्ट फिल्मों में कई बार सितारों की डेट्स के कॉम्बिनेशन बैठाने में 2-3 साल निकल जाते हैं। इसलिए फिल्मकार एक बड़े स्टार के साथ छोटे-मोटे कलाकरों को लेकर फिल्म बना लेते हैं। मगर अब फिर ट्रेंड बदल गया रहा है, क्योंकि आज ओटीटी का मुकाबला करने के लिए कलाकार ही नहीं बल्कि मेकर भी ऐसे सब्जेक्ट बनाना चाहता है, जहां एक से ज्यादा स्टार हों और दर्शक थिएटर का रुख करे।' प्रड्यूसर बनने के बाद स्टार का गणित बदल जाता हैनामी ट्रेड पंडित तरण आदर्श कहते हैं, 'मल्टी स्टार कास्ट वाली फिल्मों का ट्रेंड बहुत पुराना है। 'मदर इंडिया', 'मुगल-ए-आजम', 'वक्त' जैसी फिल्में इस मामले में तब भी आइकॉनिक साबित हुई हैं। 80-90 के दशक में ऐसी फिल्मों ने काफी धूम मचाई। मगर फिर जब बड़े स्टार खुद प्रड्यूसर बने, तो उन्होंने अपने पावर को दर्शाने के लिए सिंगल हीरो वाली फिल्मों पर अपनी पसंद उतारनी शुरू कर दी और ये उनकी शो रील के साथ-साथ उनका शक्ति प्रदर्शन भी होता है। सच तो ये है कि एक से ज्यादा सितारों वाली फिल्म बनाना बहुत ही साहस का काम होता है। गिने-चुने मेकर्स ही ये साहस कर पाते हैं। आने वाले समय में बहुल सितारों वाली फिल्मों का बनना वक्त की मांग है।'


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